देसी पंजाबी भाभी की चुदाई

हेलो दोस्तों मे आज आप को बताउगा की कैसे मेने एक देसी पड़ोसन पंजाबी भाभी की चुत गांड चोदी।
मेरे घर के पड़ोस में एक पंजाबी भाभी रहती है उनका नाम मनजीत है ,

मनजीत की उम्र भले ही 48 साल थी लेकिन उसके चेहरे की कशिश और बदन की कसावट मेरा लण्ड खड़ा करने के लिए काफी थी. मनजीत को चोदने के लिए मैं करीब 12 साल से प्रयासरत था लेकिन नाकाम रहा.

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मेरी यही नाकामी मुझे बार बार कचोटती थी और फिर से मनजीत का दरवाजा खटखटाने के लिए उकसाती थी.

इसी कोशिश में मैंने एक दिन मनजीत को फोन किया, फोन पर मेरी मनजीत से पहली बार बात हो रही थी.
अपना परिचय देकर बात शुरू की. मैंने कहा- भाभी, आपको इस मुहल्ले में आये हुए 12 साल हो गये. एक कहावत सुनी है कि 12 साल में घूरे के भी दिन बहुर जाते हैं लेकिन इस नाचीज़ के दिन नहीं बहुरे. 12 साल पहले जब आपको पहली बार देखा था तो लगा था कि आपका मेरा कोई पूर्व जन्म का रिश्ता है और आपका प्यार पाकर मैं निहाल हो जाऊंगा. लेकिन ऐसा हो न सका और मैं आज भी उस पल के लिए तड़प रहा हूँ

कि आपका हाथ अपने हाथ में लेकर अपने दिल की बात कह सकूं, आपकी गोद में सिर रखकर अपना मन हल्का कर सकूं. किसी महिला के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना मेरा उद्देश्य नहीं लेकिन जब सम्बन्ध हों तो शारीरिक सम्बन्ध बनाना महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि शारीरिक सम्बन्ध प्रेम की पराकाष्ठा होते हैं. एक महिला जब अपना शरीर किसी पुरुष को सौंपती है और बदले में पुरुष अपना शरीर उस महिला के जिस्म की गहराइयों में उतार देता है तो वह पल अनमोल होता है. मैंने आपसे बेइंतहा प्यार किया है, भाभी. बस मुझे अपने आंचल में छुपा लो.

मेरी सारी बात सुनने के बाद मनजीत बोली- देखो विजय, प्रकृति ने स्त्री और पुरुष दोनों को बनाया है, दोनों की भावनात्मक और शारीरिक जरूरतें होती हैं. जहां पुरुष स्वतंत्र होता है, वहीं नारी पर परिवार और समाज का बंधन होता है. नारी के पास पुरुष की आंखें और बॉडी लैंग्वेज समझने का विशेष गुण होता है. ऐसा नहीं कि मैंने तुम्हें कभी नोटिस नहीं किया लेकिन मैं आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाई. लेकिन मैं तुमसे वादा करती हूँ, मुझे थोड़ा समय दो. मैं तुम्हारे इजहार की कद्र करती हूँ और मैं खुद तुम्हारी बांहों में झूलने के लिए बेकरार हूँ, बस थोड़ा सा समय मुझे दे दो. और हां, मुझे भाभी न कहा करो, मनजीत कहा करो, सिर्फ मनजीत.

मेरा तीर सही निशाने पर लगा था.

दो दिन बाद मनजीत का फोन आया- आज रात को मेरे हाथ का बना खाना खाओगे?
“जहे नसीब, मनजीत. मैं जरूर आऊंगा.”

रात को 8 बजे मैं मनजीत के घर पहुंचा, उसने दरवाजा खोला और गले लगकर मेरा स्वागत किया. हम दोनों सोफे पर बैठ गये.

मनजीत सूप ले आई और सूप पीते पीते बोली:

विजय, मैं काफी सोच समझकर तुमसे रिश्ता जोड़ रही हूँ. मेरा अभी तक का जीवन कुछ खास सुखमय नहीं रहा है. परमजीत से मेरी शादी को करीब 26 साल हो गये हैं. 26 साल में परम ने न तो मुझे भौतिक सुख दिये, न मानसिक. यहां तक कि मैं शारीरिक रूप से सदा असंतुष्ट ही रही हूँ.

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शुरू से ही परम की टूरिंग जॉब है, महीने में 15-20 दिन टूर पर रहना और साथ होने पर भी बात बात पर झगड़ना, गाली गलौज करना परम की आदत रही है. महीने में एक दो बार रात को मेरे पास आना और जल्दी से अपना काम निपटा कर सो जाना ही उसकी मर्दानगी है.

मैंने जिन्दगी के तमाम साल तड़प कर गुजारे हैं. परम ने कभी मेरी भावनाओं का ख्याल नहीं रखा.

मुझे अच्छे से याद है कि जब मेरी शादी को चार छह महीने हुए थे तो मेरी कई सहेलियों ने मेरी सेक्स लाइफ पर बात करते हुए पूछा- सरदार जी आगे ही करते हैं या पीछे भी करते हैं?
मैंने उन्हें जवाब दिया- क्या पूछ रही हो, मैं समझी नहीं?
इस पर मेरी सहेलियों ने कहा- अरे मेरी गाय, हम पूछ रहे हैं कि सरदार जी तुम्हारी चूत ही मारते हैं या गांड भी मारते हैं? मेरे मना करने पर सहेलियों ने मुझे उकसाया कि गांड भी मराया करो, उसका अलग मजा है.

मैंने गांड मराने की तैयारी कर ली. रात को परम बेड पर आये. अब मैं यह तो नहीं कह सकती थी कि मेरी गांड मारो, इसलिये मैंने सहेलियों का नाम लेकर बताया कि वो क्या कह रही थीं.

मेरे उकसाने पर परम मेरी गांड मारने के लिए उत्सुक हो गये. मुझे जल्दी से नंगा करके घोड़ी बना दिया और मेरे पीछे आकर अपना लण्ड मेरी गांड के छेद पर टिका दिया. काफी देर तक कोशिश करने के बावजूद जब परम अपना लण्ड मेरी गांड में नहीं डाल पाये तो झल्लाकर बोले- तुम्हारी सब सहेलियां मादरचोद हैं, तुमको उल्टा सीधा पढ़ाती हैं.

मुझे उस दिन पहली बार अहसास हुआ कि परम के लण्ड में शायद उतना दम नहीं है कि मेरी गांड में घुस सके.

इस तरह के निजी अनुभव सुनाते सुनाते मनजीत की आंखें छलक पड़ीं तो मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा- खाना तैयार हो तो चलो खा लें?
“सब तैयार है, बस रोटी सेंकनी है.” इतना कहकर मनजीत उठी और थोड़ी देर में रोटियां सेंक कर ले आई.

हम दोनों ने खाना खाया. घड़ी में समय देखा, दस बज रहे थे.

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मैं खड़ा हुआ तो मनजीत मेरे करीब आई और मैंने मनजीत की साड़ी का पल्लू उसके सिर पर रखा और उसे अपने सीने से लगा लिया. कुछ देर तक मेरे सीने से लगे रहने के बाद मनजीत मुझसे अलग हुई. मनजीत ने मेरी शर्ट के बटन खोल दिये और अपनी साड़ी उतार दी.
मेरे सीने से लगकर मनजीत बोली- मैं तुम्हारे हवाले हूँ, विजय. मुझे प्यार करो, मेरा अधूरापन दूर कर दो विजय.

मैंने मनजीत का हाथ पकड़ा और बेडरूम में ले गया. बेडरूम में जाकर मैंने मैंने अपनी शर्ट व बनियान उतार दी और मनजीत का ब्लाउज व ब्रा उतार दी. मनजीत के पेटीकोट का नाड़ा खींच कर मैंने अलग कर दिया.
अब मनजीत के शरीर पर सिर्फ पैन्टी थी.

मनजीत को बेड पर लिटाकर मैंने उसे चूमना शुरू किया. दरअसल मैं मनजीत को चूम नहीं बल्कि चूस रहा था, उसके जिस्म को मैं जहां भी चूसता, वहां लाल, मैरून रंग का निशान बन जाता. मनजीत के गले और चूचियों पर ऐसे बीसों निशान बनाने के बाद मैंने मनजीत को पलटा दिया और उसकी गर्दन व पीठ पर ऐसे निशान बनाने लगा.

पीठ से जब मैं कमर पर आया तो मैंने मनजीत की पैन्टी उतार दी. मनजीत के गोरे गोरे चूतड़ देखकर मेरे मन में आया कि क्यों न मनजीत से अपने सम्बन्धों की शुरुआत इसकी गांड मार कर की जाये. बस यही सोचकर मैंने मनजीत के चूतड़ चाटने शुरू कर दिये.

मनजीत के चूतड़ चाटते चाटते मैंने उसकी टांगें फैला कर अपनी जीभ मनजीत की गांड के छेद पर रख दी. जब जब मैं उसकी गांड का छेद चाटता, मनजीत कसमसा जाती. मैं समझ रहा था कि मनजीत गांड मराने के लिए तैयार हो चुकी है.

मैंने मनजीत का ड्रेसिंग टेबल खोला और वहां से कोल्ड क्रीम की शीशी निकाल लाया. अपनी पैन्ट व अण्डरवियर उतारकर मैं कोल्ड क्रीम से अपने लण्ड की मसाज करने लगा. चूंकि मनजीत घोड़ी बनी हुई थी इसलिये मेरे लण्ड का दीदार नहीं कर पा रही थी.

लण्ड की मसाज करके थोड़ी सी क्रीम मैंने अपनी हथेली पर ले ली और मनजीत के पीछे आकर उंगली में क्रीम लगाकर उसकी गांड में चलाने लगा. दो तीन बार उंगली में क्रीम लगाकर मनजीत की गांड की मसाज करके मैंने पूछा- कैसा लग रहा है, मनजीत?
“कुछ न पूछो, विजय. बस जो मन में आये, करते रहो.”
“ऐसी बात है तो यह लो.”

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इतना कहकर मैंने अपने लण्ड का सुपाड़ा मनजीत की गांड के छेद पर रखा. अपने दोनों हाथों से मनजीत के चूतड़ फैला कर उसकी गांड का छेद चौड़ा करते हुए मैंने अपना लण्ड मनजीत की गांड में ठोक दिया.

अभी आधा लण्ड ही अन्दर गया था कि घों घों करते हुए मनजीत बोली- बहुत दर्द हुआ, विजय.
“कोई बात नहीं, पहली बार है, कुछ दर्द तो होगा.” ये कहते कहते मैंने पूरा लण्ड मनजीत की गांड में उतार दिया और धीरे धीरे से अन्दर बाहर करने लगा.

थोड़ी देर बाद मैंने मनजीत से पूछा- अब दर्द तो नहीं हो रहा?
“नहीं, दर्द नहीं हो रहा लेकिन मेरी टांगें दुखने लगी हैं, थोड़ी देर सीधा लेट जाने दो.”

अपने लण्ड की रफ्तार बढा़ते हुए मैंने कहा- बस दो मिनट और.

मैंने दोनों हाथों में मनजीत की चूचियां पकड़ लीं और फुल स्पीड से उसकी गांड मारने लगा. कुछ देर बाद मेरे लण्ड से पिचकारी छूटी और मनजीत की गांड मेरे वीर्य से सराबोर हो गई.

मैंने अपना लण्ड मनजीत की गांड से बाहर निकाला तो देखा उस पर खून के निशान थे, शायद मनजीत की गांड के चुन्नट फट गये थे और वहीं से खून रिसा होगा.

मैं बाथरूम गया, पेशाब किया और पसीने से तरबतर अपने शरीर को राहत देने के लिए मैंने शावर खोल दिया, तभी मनजीत बाथरूम में आई और मेरी पीठ से चिपक गई.

मैंने मनजीत को आगे खींचा और अपने सीने से सटा लिया. शावर के नीचे लिपटे खड़े दो जिस्म अभी भी आग से भरे हुए थे.

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मैंने मनजीत की चूत पर हाथ फेरा तो मनजीत मेरा लण्ड सहलाने लगी. मनजीत ने शावर बंद कर दिया और नीचे बैठकर मेरा लण्ड चूसने लगी. थोड़ी ही देर में मेरा शेर शिकार के लिए फिर से तैयार हो गया.

मनजीत को खड़ी करके उसका एक पैर मैंने कमोड पर रखा और अपने लण्ड का सुपारा उसकी चूत के मुखद्वार पर टिका दिया. मनजीत के चूतड़ों को अपनी ओर खींचते हुए मैंने अपना लण्ड आगे धकेला तो मेरे लण्ड का सुपाड़ा मनजीत की चूत के अन्दर हो गया.

मनजीत की कमर को पकड़कर मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया तो मेरा पूरा लण्ड मनजीत की चूत में समा गया. मनजीत मुझसे लिपट गई और बेतहाशा चूमते हुए बोली- तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिले, विजय?
“तुम्हीं न देर कर दी, मैं तो कब से दस्तक दे रहा था.”
“मैं अब की बात नहीं कर रही, विजय. जब परमजीत मिला था, तब तुम क्यों नहीं मिले. अब मुझे हर जन्म में तुम्हीं मिलना.”

मनजीत मेरी गोद में थी और मेरा लण्ड उसकी चूत के अन्दर. इसी पोजीशन में मैं उसे बेड पर ले आया. मनजीत को बेड पर लिटाते समय मैंने उसके चूतड़ों के नीचे दो तकिये रख दिये.
चूतड़ के नीचे तकिया रखने से लण्ड चूत की गहराई तक उतर गया.
मनजीत के ऊपर लेटकर उसकी चूचियों से खेलते हुए मैं उसे चोदने लगा. जब लण्ड अन्दर जाता और मनजीत की बच्चेदानी से छूता तो आंखें बंद किये हुए मनजीत कहती- विजय, मेरे राजा, मेरी जान.

मनजीत को धीरे धीरे चोदते चोदते मेरा जोश बढ़ने लगा तो मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दी. जब चुदाई की स्पीड बढ़ी तो मनजीत ने आंखें खोल दीं और कुछ बोलते बोलते रह गई.

मैंने पूछा- क्या कहना चाहती हो, मनजीत?
उसने कहा- कुछ नहीं.
मैंने कहा- कोई बात हो तो कहो?
मनजीत बोली- मैंने सुना है कि सेक्स के दौरान खुलकर बोलने और अश्लील शब्दों से सेक्स का आनन्द दोगुना हो जाता है.
मैंने कहा- सही सुना है और सुनो, तुम्हें चोदने से मेरे लण्ड को जो सुकून मिल रहा है ऐसा ही कुछ तुम्हारे साथ भी हो रहा होगा, खुलकर बोलो और मजा लो.

“तुमने मुझे जन्नत दिखा दी, विजय. तुम्हारे लण्ड ने मुझे दिन में तारे दिखा दिये. तुमने मेरी गांड फाड़ दी और मैं खुश हो रही हूँ, मुझे ऐसे ही चोदते रहना, मेरी दुनिया तुम्हीं हो विजय. मुझे चोदो, चोदते रह़ो, मेरी चूत का भुर्ता बना दो. इतनी जोर जोर से चोदो कि तुम्हारा लण्ड मेरी बच्चेदानी के अन्दर घुस जाये.”

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गंदी बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो रुका नहीं और इसका लाभ यह हुआ कि मनजीत बेशर्म होकर चुदवाने लगी, उसने अपने चूतड़ उछालने शुरू कर दिये.
मनजीत के चूतड़ उछालने और मेरे धकापेल ठोकने के बावजूद मेरा लण्ड डिस्चार्ज करने के मूड में नहीं था जबकि मनजीत दो बार पानी छोड़ चुकी थी.

मेरे पूछने पर मनजीत मेरा लण्ड चूसने को राजी हो गई तो मैंने उसकी चूत से लण्ड निकाला और 69 की पोजीशन में आ गया.
मनजीत ने मेरा लण्ड पकड़ लिया और बड़ी बेरहमी से मेरे लण्ड की खाल आगे पीछे करने लगी, तभी मनजीत मेरे लण्ड का सुपारा चाटने लगी, मेरा लण्ड अब और कड़क होने लगा.

मैं फिर से उसकी चूत मारने के लिए सोचने लगा. मैंने मनजीत को घोड़ी बनाया और उसकी चूत में अपना लण्ड पेल दिया. घोड़ी बनी मनजीत की चूत काफी टाइट थी.
मनजीत की कमर पकड़कर उसकी चुदाई मैंने शुरू कर दी, जब मेरी मंजिल करीब आई तो मेरे लण्ड से निकले पानी ने मनजीत की चूत लबालब भर दी.

उस रात मैंने उसे तीन बार चोदा.

मनजीत अब पूरी तरह से समर्पित है, मेरे लिए अच्छा अच्छा खाना बनाती है और खुलकर चुदवाती है.

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